कोई कहता छोटी रुचि ,
कोई कहता है बिल्कुल मां के जैसीl
हां, मैं हूं मां की परछाई ,
मां के जैसी छवि है पाई l
कोमल मन है मां का मेरा
कोमल है मेरी मां की काया
वैसा ही रंग रूप है मैंने बिल्कुल सब कहते ,अपनी मां से पाया l
निपुण है मेरी मां कला कौशल में
मेरी मां जैसा ना कोई सृष्टि में, बिल्कुल वैसा ही कौशल मुझ में,
रहती प्रथम हर प्रतिस्पर्धा मे l
हर समय भगवान नहीं आ सकता जग में ,
इसलिए अपने रूप में मां को भेजा जग मेंl
प्यार करती मैं मां से ढेर सारा ,
गहरा सागर भी मां के प्यार से हाराl
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