Thursday, December 19, 2019

आशा है ॎएक कोशिश रिशतों को हरा-भरा रखने की

दादा दादी दादा दादी |
प्यार,समपऀण दुलार की हरी-भरी वादी |
रात की रोज एक कहानी का दादी है वादा |
पाकऀ की हर सुहानी शाम का नाम है दादा |

है तो वैसे माँ बाप के भी माँ बाप |
है तो वैसे माँ बाप के भी माँ बाप |
पर उनमें है अभी भी बचपन की छाप |
खेल सारे वे अभी भी खेले |
वो हम बिन हम उन बिन अकेले |

नया सिखने को भी उत्सुक |
पुराना बताने को भी उत्सुक |
संस्कति और इतिहास की घरोहर है ये बडे |
इनमें है हमारी मजबूत जडे |

हर दादा दादी को पोतो पोता बहुत दुलारा  |
क्यो ? पूछो तो कहते ब्याज होता मूल से भी प्यारा |
आज की आधुनिक शैली ने सयुंकत परिवार का चलन छुडाया |
हाय! ये केसा चलन जिसने दादा दादी को किया पराया |

कैसे मजबूत बनेगी संस्कारों की जडे |
कैसे मजबूत बनेगी संस्कारों की जडे |
जब रिश्ते है |यू बिखरे-बिखरे |
आओ हम सब मिलकर करे ऐसी पहल |
रिशतो में आए फिर से चहल पहल |

पनपेगी फिर एक आशा नई सी |
आशा है |एक कोशिश रिशतो को हरा-भरा रखने की |

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